(चार्ल्स फ्रांसिस हौकेट, सितम्बर १९६०, साइंटिफिक अमेरिकन) भाषा का उद्भव हमेशा वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के लिए कौतुहल का विषय रहा है पर बहुत लम्बे समय तक आवश्यक आधारभूत ढांचे और ज्ञान के अभाव में इस विषय की हमारी समझ आगे नहीं बढ़ पाई. चार्ल्स फ्रांसिस हौकेट उन लोगों में से थे जिन्होंने नये संरचनात्मक विचारों के फ्रेम में सोचा और भाषा को डार्विनवाद की दृष्टि से देखा. उन्होंने इंसानी भाषा के तेरह मौलिक लक्षण पहचाने जो एक साथ मिल कर इसे पशुओं की भाषा से अलग करते हैं. जैसा विज्ञान में अधिकतर सिद्धांतों के साथ होता है, हौकेट के विचार आधुनिक इवोल्यूशनरी भाषाविज्ञान के अनुसार असंगत और इंसानों की ओर अनावश्यक झुकाव वाले हैं. पर उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए सैद्धांतिक ढाँचे कि वजह से ही हमारी समझ गहरी हुई है. प्रस्तुत पत्र में उन्होंने भाषा के कुछ लक्षणों का इवोल्यूशन प्राणी-जगत के संचार - तंत्रों से होना सुझाया है. इन सुझावों में से कई बाद के वैज्ञानिक प्रयोगों में सच भी पाए गए. चार्ल्स फ्रांसिस हौकेट मानव अकेला ऐसा जीव है जो भाववाचक चिह्नों के माध्यम से बात कर सकता है. पर ...
(कोरा पर एक प्रश्न के उत्तर में) ______________________________ पता नहीं कब तक लोग चेतना और भगवान जैसी चीज़ों के पीछे दौड़ते रहेंगे. हमारी आदत रही है कि जिस सब को हम नहीं जानते हैं उसे कोई धुंधला सा लिहाफ़ पहना देते हैं ताकि हमारी "चेतना" यह मान सके कि हम बुद्धिमान हैं. उस लिहाफ़ का नाम चेतना, भगवान, आत्मा, डार्क मैटर जैसे कुछ भी हो सकता है. जब तक लोगों को समझ नहीं आया था कि डीएनए में जीवन का कोड है तब तक वैज्ञानिक भी कहते थे कि शायद कोशिका के केन्द्रक में डार्क मैटर भरा है. ये ब्रह्माण्ड की चेतना के ऐक्य का एक टुकड़ा है, जो हमें चेतन बनाता है. तो अगर आम आदमी उसमें विश्वास रखता है तो वो कोई इतनी बड़ी ग़लती नहीं है. प्रथम तो चेतना एक शुद्ध वैज्ञानिक शब्द नहीं है. दैनिक जीवन में इसके अलग मायने हैं, मनोविज्ञान-फ़लसफ़े के अध्ययन में अलग और न्यूरोसाइंस में अलग. तिसपर जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वैसे वो इसे अपने दिमाग में फिट कर लेता है. कहीं इसको मानवों का ख़ास गुण मान लिया जाता है, कहीं इसको आत्मा से जोड़ा जाता है और कहीं प्रकृति और पुरुष के विभाजन से. मनोविज्...