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अनूदित शोध पत्र: तीसरी सहस्त्राब्दी में सैद्धांतिक जीव विज्ञान: सिडनी ब्रेनर

सिडनी ब्रेनर
(द मॉलिक्यूलर साइंसेज़ इंस्टिट्यूट, बार्कली, यूएसए और किंग्स कॉलेज, केम्ब्रिज, यूके)

२००२ में सिडनी ब्रेनर को आणविक जीव विज्ञान में अपने योगदान के लिए बॉब होर्वित्ज़ और जॉन सल्सटन के साथ नोबेल पुरस्कार दिया गया.

उन्होंने सिनोरेहब्डिटिस एलिगेंस को वैज्ञानिक शोध के लिए उपयुक्त जीव-तंत्र के रूप में स्थापित किया. यह कृमि पारदर्शी, प्रयोगशाला में आसानी से फलने-फूलने वाला और जेनेटिक जोड़-तोड़ के लिए सुगम है; इस तंत्र ने शोध के लिए बहुत से रस्ते खोले और आज इस कारण से मष्तिष्क के निर्माण के बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं. पर ब्रेनर के योगदान का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा सैद्धांतिक जीव विज्ञान में रहा है. ब्रेनर अपने समकालीन वैज्ञानिकों के काम को हमेशा बारीकी से समझते रहे और उन्होंने साधारण सी दिखने वाली खोजों के महत्तर प्रभाव दुनिया को सुझाए. उन्होंने क्रिक और बार्नेट के साथ मिलकर जीवों में सूचना के प्रवाह को समझाया. यहाँ अनूदित पत्र १९९९ में "फिलोसोफिकल ट्रांज़ेक्शन्स ऑफ़ रॉयल सोसाइटी लन्दन" में प्रकाशित हुआ. इस पत्र में उन्होंने जीव विज्ञान शोध से उत्पन्न हुए सूचना के भण्डार को सैद्धांतिक जीव विज्ञान के माध्यम से जीवन को समझने के लिए इस्तेमाल करने हेतु वैचारिक ढांचा उपलब्ध कराया है. इतने क्लिष्ट विचार को इतने स्पष्ट और सरल तरीके से व्यक्त करना एक वैज्ञानिक के तौर पर उनकी क़ाबिलियत की मिसाल है. 

सार
20वीं शताब्दी के दौरान आनुवांशिकी और जीन अभिव्यक्ति की प्रक्रिया की हमारी समझ में ज़बरदस्त परिवर्तन आया है. आधुनिक तकनीकों से जीवित कोशिका के घटकों की पहचान की गयी है, और आनुवंशिक कोड के ज्ञान से हम जीनोटाइप से फेनोटाइप तक के रास्ते की कल्पना कर पाते हैं. अब हम पूरे जीन का अनुक्रम पता कर सकते हैं, और बेहतर क्लोनिंग तकनीकों की वजह से एक जीव से दूसरे जीव में जीनों को प्रतिस्थापित कर सकते हैं. इससे उन जीनों के उद्देश्य को बेहतर समझा जा सकता है. आधुनिक विश्लेषण-धर्मी उपकरणों के कारण अनुक्रमित जानकारी के डेटाबेस घातीय रफ़्तार से बढ़ रहे हैं. हो सकता है, जल्द ही जीनोमों का समूचा अनुक्रम और सभी प्रोटीनों की त्रिआयामी संरचना पता कर ली जाए. नई सहस्राब्दी में हमारे समक्ष प्रश्न यह है कि इस जानकारी को सार्थक तरीके से कैसे काम लेना है. चूंकि जीन एक जीव के निर्माण से सम्बंधित निर्देश पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं, और क्रमिक विकास के दौरान होने वाले परिवर्तन भी रिकॉर्ड करते हैं, हमें एक सैद्धांतिक रूपरेखा तैयार करने की जरूरत है जो जैविक तंत्रों के माध्यम से सूचना के प्रवाह को ध्यान में रख सके.



जीवों का अपनी तरह के जीव को उत्पन्न करना जीव विज्ञान का मौलिक नियम है और शायद आनुवंशिक ज्ञान का सबसे पुराना पाठ भी. 20वीं शताब्दी के दौरान, सहस्राब्दी के अंत में अनुवांशिकता की हमारी समझ में कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, 1901 में मेंडेल के नियमों की पुन: खोज से वाटसन और क्रिक के डीएनए की दोहरी कुंडली से होते हुए अंतिम दशक में जीनोम के डीएनए अनुक्रमण तक. आनुवंशिकी सिर्फ़ गुणों के अलगाव और पुनः वितरित होने से सम्बद्ध विषय से जीन के सीधे अध्ययन करने वाले विषय में बदल गया है. इससे हम यह समझ पाए हैं प्रकृति में जीव ख़ास जटिल तंत्र हैं, जिनके डीएनए में उनकी संरचना, कार्य, निर्माण और इतिहास के निर्देश कोडित होतें हैं.

साथ ही में, जैव-रासायनिकी की तरक्क़ी से हमें विस्तृत जानकारी मिली है कि कैसे ऊर्जा रासायनिक बॉण्ड में और बॉण्ड ऊर्जा में परिवर्तित होते है और जीवित कोशिकाओं के मूल रासायनिक घटक कैसे बनते हैं. हम समझते हैं कि जीन से प्रोटीन तक सूचना कैसे आगे बढती है. हमें पता है कि जीन से जानकारी संदेशवाहक आरएनए में कॉपी होती है, कि इस आरएनए को राइबोसोम अनूदित करता है और यह कि कोड परिवहन आरएनए द्वारा तिकड़ियों में पढ़ा जाता है, प्रत्येक परिवहन आरएनए 20 एमिनो एसिड में से एक लेकर चलता है. हम पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला शुरू करने और रोकने के लिए विशेष संकेत जानते हैं और प्रत्येक एमिनो एसिड के लिए तिकड़ी कोड. आनुवंशिक कोड सार्वभौमिक है, कुछ जीवों और अंगों में इस नियम के कुछ मामूली अपवादों के सिवाय.

1970 के दशक के मध्य में कई प्रमुख तकनीकी खोजें हुईं. डीएनए आणविक क्लोनिंग का आविष्कार, डीएनए के अनुक्रमण के तरीक़े और ओलिगोन्युक्लियोटाइड संश्लेषण -- इन तकनीकों से आनुवंशिकीविदों ने जीन क्लोन किए, उनका अध्ययन किया, और उन जीनों के प्रोटीन उत्पादों को बड़ी मात्रा में बनाया. सैद्धांतिक तौर पर एमिनो एसिड का अनुक्रम डीएनए अनुक्रम से पता किया जा सकता है, हालांकि बड़े जीवों के जीनोम में पाए जाने वाले इंट्रोन्स की उपस्थिति कुछ कठिनाइयों का कारण हो सकती है. जो भी हो, डीएनए का अनुक्रमण प्रोटीन के एमिनो एसिड अनुक्रमों को पता करने का सहज तरीका बन गया, जिसे सीधे पता करना पहले एक लम्बा और दुस्साध्य काम था.

क्रिक की अनुक्रम परिकल्पना का एक ज़रूरी आयाम था कि एमिनो एसिड अनुक्रम में निहित जानकारी एमिनो एसिड श्रृंखला के तह होकर गोलाकार प्रोटीन की त्रि-आयामी (3 डी) संरचना बनना निर्धारित करने के लिए पर्याप्त थी. कई प्रोटीनों के लिए यह प्रक्रिया अनायास होती है, लेकिन बहुत से मामलों में शेपेरोनिन नामक विशेष प्रोटीन का उपयोग अणुओं के तह होने को सुगम बनाने के लिए किया जाता है. एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और नुक्लियर मैग्नेटिक रेज़ोनेंस तकनीकों में हुई उन्नति के कारण हम बड़ी संख्या में प्रोटीन अणुओं और यहां तक कि पेचीदा प्रोटीन असेंबलियों की आणविक संरचना पता कर सकते हैं. लेकिन एक-आयामी पॉलीपेप्टाइड के तह होकर एक सक्रिय संरचना बनने की समस्या अभी तक अनसुलझी है और शायद अभेद्य हो.

इन नए तरीकों ने जीवों की आनुवंशिकी के अध्ययन के नए खजाने खोल दिए. उत्परिवर्तित जीन की क्लोनिंग से हमें जीन के प्रोटीन उत्पाद को पाने का सीधा रास्ता मिला और जैसे-जैसे ज्ञान बढ़ा, यह स्पष्ट हुआ कि वह प्रोटीन उत्पाद कैसे काम करता है और फेनोटाइप का कारण कैसे बनता है। इस प्रकार प्रायोगिक आनुवंशिकी प्रजनन चक्रों की क्लिष्टता से मुक्त हुई और विशेष रूप से अब तक दुस्साध्य रही मानव आनुवंशिकी के लिए नए दृष्टिकोण मिले. इन तरीकों की मदद से हमें जीनों को एक जीव से दूसरे जीव में ले जाने, खमीर कोशिकाओं में मानव जीन के कार्य का विश्लेषण करने और चूहों में मछली जीन के व्यवहार करने का अध्ययन करने का मौक़ा दिया.

जीवित जीवों की एक महत्वपूर्ण विशेषता उनके कार्यों का नियमन है. जैकब और मोनॉड ने आनुवांशिक स्तर पर दिखाया कि कुछ प्रोटीन डीएनए के खंडों को पहचान सकते हैं और उन खण्डों के आसन्न जीन-कार्य को बंद कर देते हैं. शुरू में इन निरोधकों को नियमन का एकमात्र तरीका मान लिया गया था, पर अब हम जानते हैं कि कई नियामक प्रोटीन जीन-कार्य को बढ़ावा देते हैं. जटिलतर मेटाज़ोआ में, बड़ी मात्रा में नियामक जीन होते हैं, जो संतति के विकास में कार्य करने वाले कई जीनों की कोशिकाओं में अभिव्यक्ति के समय-स्थान और वयस्कों में अनुकूलक प्रतिक्रियाओं के समय-स्थान को निर्देशित करते हैं. विविध कोशिकाओं की झिल्लयों में रिसेप्टर प्रोटीनों के अलग-अलग समुच्चय जड़े होतें हैं, जो कोशिका के बाहर पहुंचे हुए संकेतों को कोशिका के अन्दर प्रेषित करतें हैं. संकेतों को झिल्ली के पार भेजने वाली मशीनें, जो आपस में सांकेतिक बातचीत करते हुए प्रोटीनों का एक जटिल सेट है, इन संकेतों को रासायनिक मुद्रा में बदलता है, जिसकी मदद से कोशिका की वृद्धि, विभाजन, गति, स्रवण और विभेदीकरण सहित अन्य कई कार्यों को नियंत्रित किया जाता है. बहुकोशिकीय जीवों में जटिलता नए जीनों को शामिल करके नहीं नहीं बल्कि जीन अभिव्यक्ति के नियमन से प्राप्त की गई है. यह जटिलतर जानवरों के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में आदर्श रूप में दिखता है जहाँ आणविक सत्ताओं एक ही टीम का उपयोग जटिल कोशिकीय जाल बनाने के लिए किया जाता है.

अंत में अप्रत्याशित रूप से यह पाया गया कि समकालीन कोशिकाओं में ऐसे आरएनए अणु भी होते हैं जो कि उत्प्रेरक कार्य करते हैं. संभव है कि प्रोटीन का इस्तेमाल करना प्रारंभ करने से पहले, बहुत प्रारंभिक विकास के समय से बचे हुए आरएनए अवशेष हैं. आरएनए के उत्प्रेरक कार्यों की खोज ने वो अणु प्रदान किया जो उत्प्रेरण और सूचना ले जाना, दोनों साथ में कर सकता था और इस प्रकार वर्तमान फ़ासले को भर सकता था, जहां सूचना ले जाने का काम न्यूक्लिक एसिड द्वारा किया जाता है और प्रोटीन उत्प्रेरक का काम करते हैं. इससे जीवन कैसे शुरू हुआ – यह समझने में आने वाली महत्वपूर्ण समस्याओं में से एक का समाधान हुआ.

अनुक्रम सूचना के डेटाबेस अब एक ज़बरदस्त दर से बढ़ रहे हैं और शोधकर्ताओं की संख्या और उत्पादकता भी काफी बढ़ गई है. ऐसा नहीं लगता कि जानकारी जमा करने की कोई सीमा हो सकती है, और आज, सहस्राब्दी के अंत में, हम इस सवाल का सामना करते हैं कि इस सारी जानकारी के साथ क्या किया जाए. इस समस्या पर व्यापक रूप से बहस हुई है और इससे इलेक्ट्रॉनिक रूप से निपटने की योजना है, भले ही वो कागज़ के पुलिंदों से बचने के लिए हो. जीवविज्ञानियों को जल्द ही लगभग सारा वक़्त अपने कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिताना पड़ सकता है. अगर यह संभव है तो -- कंप्यूटर को इस जानकारी को ज्ञान के रूप में व्यवस्थित करने और इसे हमें सिखाने हेतु पर्याप्त बुद्धिमान बनने में लम्बा समय लगेगा. सहस्राब्दी के अंतिम महीनों में लिखते हुए यह स्पष्ट है कि भविष्य के लिए पहला ज़रूरी बौद्धिक कार्य है जीव विज्ञान के लिए एक उपयुक्त सैद्धांतिक रूपरेखा तैयार करना.

दुर्भाग्य से, सैद्धांतिक जीवविज्ञान अपने अतीत के कारण बदनाम है. भौतिकविद “क्या जैविक प्रणालियाँ ऊष्मगतिकी के द्वितीय कानून के साथ संगत हैं” और “क्या उन्हें क्वांटम यांत्रिकी द्वारा समझाया जा सकता है” जैसे प्रश्नों के बारे में चिंतित थे. कुछ लोगों ने जीव विज्ञान से भौतिक विज्ञान के नए नियमों का उद्घाटन करने की उम्मीद भी की. संतति-विकास और मस्तिष्क के लिए सार्वभौमिक गणितीय सिद्धांतों की तलाश करने के प्रयास भी किए गए हैं: आपदा सिद्धांत का उपयोग केवल एक उदाहरण है. हालांकि विकल्पों का सुझाव दिया गया है, जैसे कि गणितीय जीव विज्ञान, जैविक तंत्र सिद्धांत और समग्र जीव विज्ञान. मैंने अतीत को भूलने और माफ करने का निश्चय किया है और मैं इसे सैद्धांतिक जीव विज्ञान कहूँगा.

अब इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता है कि जीवित प्रणालियों के कुछ हिस्सों को भौतिकी के सिद्धांतों के संदर्भ में समझा जा सकता है: उदाहरण के लिए, झिल्ली में जड़े चैनलों से आयनों का गुजरना या रक्त वाहिकाओं में रक्त का प्रवाह. ये भौतिक घटनाएं हैं, जो कृत्रिम झिल्ली या पाइपों में नहीं, हमारे शरीर होतीं हैं. जैविक प्रणालियों में अणुओं की रसायनिकी से संबंधित सिद्धांत का भी काफी विचार है, उनकी सांकेतिक बातचीत के भौतिक रसायन शास्त्र के साथ. लेकिन इनमें से कोई भी जैविक प्रणालियों की नई विशेषता पर विचार नहीं करता: वह यह कि, पदार्थ और ऊर्जा के प्रवाह के अलावा, जैविक प्रणालियों में जानकारी का प्रवाह भी होता है. जैविक प्रणालियां सूचना प्रोसेस करने वाली मशीनें हैं और यह हमारे किसी भी सिद्धांत का एक अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए. इसलिए हमें इस सब का आधार जीन को बनाना होगा, क्योंकि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीव की ख़ासियतों को आगे ले जाते हैं और क्योंकि ये वो सत्ता हैं जो क्रमिक विकास में होने वाले परिवर्तन रिकॉर्ड करते हैं.

इस समस्या को सोचने का एक तरीका यह पूछना है कि क्या हम जीव के डीएनए अनुक्रमों की गणना मात्र से जीव को समझ सकते हैं. यह गणितीय दृष्टिकोण वॉन न्यूमैन के सुझाव से आया है जिसके अनुसार बहुत ही जटिल व्यवहार केवल उस एल्गोरिथ्म के उपलब्ध होने से ही समझे जा सकते हैं जो उस व्यवहार को उत्पन्न करता है, अर्थात, सिमुलेशन के द्वारा समझना. यह बात बहुत स्पष्ट होनी चाहिए कि यह ख़ाली जीव के व्यवहार का वर्णन करने का एक और तरीका नहीं होना चाहिए. उदाहरण के लिए, कंप्यूटर प्रोग्राम लिखना काफी आसान है, जो कि कंप्यूटर स्क्रीन पर हिलते कृमियों की अच्छी नक़ल करेगा. लेकिन जब हम इस प्रोग्राम की जांच करते हैं, तो इसे त्रिकोणमितीय गणनाओं से भरा हुआ पाया जाता है और इसमें न्यूरॉन्स या मांसपेशियों सम्बद्ध कुछ भी नहीं है. यह प्रोग्राम एक नक़ल है; इसकी मदद से किये जाने वाले हेर-फेर कृमि को नहीं बल्कि उसकी दिखाई गई छवि को बदलेंगे. एक ढंग के सिमुलेशन को वस्तु की मशीनी सांकेतिक भाषा, जीन, प्रोटीन और कोशिकाओं से अभिव्यक्त होना चाहिए। यह समझते हुए हम पाते हैं कि एलन ट्यूरिंग की कसौटी, जो एक कंप्यूटर और इंसान के बीच भेद कर सकती है, एक अच्छी नक़ल की कसौटी है, सिमुलेशन की नहीं.

हमारे विश्लेषण-धर्मी उपकरण इतने शक्तिशाली हो गए हैं कि हर चीज़ का पूरा विवरण प्राप्त किया जा सकता है. असल में, किसी जीव के डीएनए अनुक्रम को प्राप्त करना पहला कदम माना जा सकता है, और फिर हम सभी परिस्थितियों के तहत हर जीन की अभिव्यक्ति की मात्रा और हर प्रोटीन की 3डी संरचना निर्धारित करके आगे बढ़ सकते हैं. हालांकि, यह सूचना प्रोसेस नहीं की जा सकेगी और अधूरी भी होगी, क्योंकि विविध संभावित परिस्थितियों का कोई अंत नहीं हैं. केवल विवरण से गणना नहीं की जा सकेगी, और नवीन परिवर्तनों के साथ काम नहीं किया जा सकेगा. दूसरी ओर, एक ढंग के सिमुलेशन हम प्रेडिक्शन कर पाएंगे; मॉडल पर प्रयोग से यह क्या कर सकता है की गणना कर पाएंगे. इस प्रकार, अगर यह सिमुलेशन सफलतापूर्वक किया जाता है, तो कम से कम ज़रूरी जानकारी की गणना से बहुत सारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है. यह कम-से-कम ज़रूरी जानकारी निश्चित तौर पर डीएनए अनुक्रम है, किसी जीव का सबसे छोटा विवरण.

प्रभावी ढंग से यह करने के लिए न केवल हमें मशीन भाषा की शब्दावली का उपयोग करना चाहिए, लेकिन हमें जैविक प्रणाली के व्याकरण के बारे में भी ध्यान देना चाहिए. यह साफ़ होना चाहिए होगा कि यह किस तरह की एक सूचना प्रोसेसिंग मशीन है. ऐसे में दो प्रकार के उपकरणों पर विचार कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर हम उन उपकरणों पर विचार करते हैं जो गणितीय कार्यों के मूल्यों का उत्पादन करते हैं. हम एक पी-मशीन कहते हैं क्योंकि इसमें प्रोग्राम शामिल हैं. जब फ़ैक्टोरियल(5) का मूल्य माँगा जाता है, तो प्रणाली के निर्देश पर एक प्रोग्राम काम करता है जो उत्तर की गणना करता है. दूसरे प्रकार की मशीन को टी-मशीन कहा जाता है. इसके पास प्रोग्राम की बजाय एक तालिका है, और उसी प्रश्न के जवाब में, प्रणाली की प्रक्रिया फ़ैक्टोरियल लेबल वाली तालिका में पांचवीं प्रविष्टि दिखा देती है. अब टी-मशीन का फायदा यह है कि तालिका में मौजूद मूल्यों को किसी भी विधि द्वारा पहले से गणना किया जा सकता है - हाथ से, यांत्रिक कैलकुलेटर द्वारा - और एक बार जवाब ज्ञात हो जाता है कि इसे संग्रहीत किया जाता है और फिर गणना की ज़रूरत नहीं होती है. स्पष्ट है कि जिस स्तर पर हम विचार कर रहे हैं, जैविक प्रणालियां टी-मशीनें हैं; क्रमिक विकास ने तंत्र के कोशिश और चूक विधि द्वारा प्रणाली के लिए मूल्यों की गणना की है; चयन और उत्तर अब जीन तालिकाओं में देखा जाता है. इस प्रणाली में कोई अनिवार्य निर्देश नहीं है और इसी कारण से वजह है कि मैंने आनुवंशिक “प्रोग्राम” के इस्तेमाल के स्थान पर इसे एक “विवरण” कहा है. बेशक जीव अन्य स्तरों पर पी-मशीनें हैं, जैसे दिमाग के कामकाज में. ग़ौर करें, अगर स्मृति भंडारण एक सीमित संसाधन है, तो पी-मशीन को प्राथमिकता दी जाएगी, जो कि डिजिटल कंप्यूटर के विकास के दौरान हुआ. आज भंडारण सस्त और प्रचुर है, और अब अधिक से अधिक कम्प्यूटर प्रणालियाँ गणना में प्रोसेसर का समय बर्बाद करने के बजाय तालिकाओं से काम लेते हैं.

व्याकरण के एक दूसरे पहलू पर टिप्पणी की आवश्यकता है. जीनोम में जीन से ऊपर के स्तर पर कोई अतिरिक्त सूचना नहीं होती है. ना ही वे साफ़ तौर पर जाल, चक्र या कोशिकीय कार्य के किसी अन्य समूह को परिभाषित करते हैं. कोशिका इन समूहों की गणना प्राथमिक जीन उत्पादों के गुणों के आधार पर करती होगी. जैव-संश्लेषण के रास्तों का अस्तित्व प्रत्येक एंजाइम द्वारा निर्दिष्ट दर पर निर्धारित परिवर्तनों को पूरा करने के कारण होता है; बायोकैमिस्ट्री की पाठ्यपुस्तकों में कोरे जाने वाले मार्ग अमूर्त होते हैं और वैसे नहीं है जैसे रेलवे नेटवर्क में पटरियों से जुड़े स्टेशन. हमें बहुत सावधान रहने की ज़रूरत है कि हम वास्तविकता पर अपने विचारों और परिप्रेक्ष्यों को न थोपें और इस प्रकार की बनावटी गड़बड़ियों से बचने के लिए जीन के आणविक स्तर पर जानकारी को जमाना महत्वपूर्ण है. जब हम एक ही स्थान पर चलने वाली कई समानांतर प्रक्रियाओं से निपटने का प्रयास करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है. भले ही सम्पूर्ण स्तर पर तंत्र को समग्र रूप से परिभाषित करना संभव न लगे, पर तंत्र निश्चित रूप से अपने तत्वों के गुणों से उत्पन्न होता है क्योंकि तंत्र का अस्तित्व है और वो प्राकृतिक चयन के दौरान बच गया है. चूंकि क्रमिक विकास फिर से शुरू करना संभव नहीं है, इसलिए हर नया कदम पहले से हो चुकी घटनाओं के हिसाब से तर्कसंगत होना चाहिए; जैविक प्रणाली टुकड़े टुकड़े में संशोधन और संवर्धन द्वारा बदल गई है. प्राकृतिक चयन सही, या सुरुचिपूर्ण यहाँ तक कि “सर्वोत्तम” समाधान भी नहीं ढूंढता, जो अभीष्ट है वह सिर्फ़ एक संतोषजनक समाधान ढूंढना है.

क्या संभावना है कि हम वास्तव में डीएनए अनुक्रम से एक साधारण जीव की गणना कर सकते हैं? हम जीन श्रृंखला से विश्वसनीय रैखिक पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलाएँ प्राप्त कर सकते हैं. पर प्रोटीन के तह होने की समस्या अनसुलझी है और बहुत मुश्किल है. यक़ीनन, तह होने की समस्याएँ संख्या में उतनी हो सकती हैं जितने प्रोटीन हैं. हम अच्छे आकलन-आधारित समाधानों का सहारा ले सकते हैं. क्योंकि प्रोटीन्स ‘डोमेन’ नामक छोटी संरचनाओं से मिलकर बनता है जिनके अनुक्रम के हस्ताक्षर का उपयोग अन्य ज्ञात संरचनाओं के साथ समानता जानकर 3डी संरचनाओं का आकलन करने के लिए किया जा सकता है. इसके बाद हमारे समक्ष इन प्रोटीनों की उनके रासायनिक पर्यावरण और अन्य प्रोटीनों के साथ इंटरैक्शन की गणना करने जैसे कहीं अधिक कठिन काम हैं. यह असंभव हो सकता है, लेकिन यह भी हो सकता है कि हमारे पास इस परिणाम तक पहुँचने के लिए संबंधित प्रोटीनों के बारे में पर्याप्त जानकारी हो. प्रोटीनों की गहरी जानकारियां, उनके विशिष्ट बंध स्थिरांक, और एंजाइमों के मामले में उनके द्वारा सबस्ट्रेट्स को बदलने की दर -- फिर से जीन अनुक्रम से होने वाली गणना की पहुंच से परे हो सकते हैं, क्योंकि एक ही प्रोटीन की तह होने की समस्या के कई समान समाधान हो सकते हैं.

कोशिकाओं के सैद्धांतिक मॉडल का निर्माण जीनों पर नहीं बल्कि उनके प्रोटीन उत्पादों पर और इन प्रोटीन द्वारा निर्मित अणुओं पर आधारित होगा. हमें प्रोटीन संरचना और कार्य की सभी कठिन समस्याओं को हल करने के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा, हमें जिन गुणों की आवश्यकता है उन्हें मापकर हम आगे बढ़ सकते हैं. जीव के स्तर पर हम कोशिकाओं के साथ शुरू कर सकते हैं और फिर, हमें जिस जानकारी की आवश्यकता हो, उसे माप सकतें हैं. पाठक शिकायत कर सकता है कि मैंने 'पारंपरिक जैव रसायन और फिजियोलॉजी को जारी रखो' से अधिक कुछ नहीं कहा है. यक़ीनन, मैंने वही कहा है कि, लेकिन मैं चाहता हूँ कि नै जानकारी जैव रसायन और फिजियोलॉजी में एक सैद्धांतिक ढांचे में जुड़ी हो, जहां एक स्तर पर गुण उससे निचले स्तर से गणना द्वारा पुनः-उत्पादित की जा सके.

दो जीनोमों की तुलना करना इससे बहुत आसान होगा. कोई भी दो मानव जीनोमों के डीएनए अनुक्रम में प्रत्येक 1000 इकाई में एक या दो भिन्नताएँ होतीं हैं. अगर एक चिंपांज़ी जीनोम की तुलना किसी मानव जीनोम से की जाए तो ये भिन्नताएँ प्रति 1000 इकाइयों पर लगभग 10 हो जाती है. इनमें से अधिकतर भिन्नताओं का कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं होता हैं क्योंकि वे जीनोम के ऐसे क्षेत्रों या स्थिति में होते हैं, जहां उनका यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि वे तटस्थ हैं. यह पूछना दिलचस्प होगा कि क्या हम अर्थपूर्ण भिन्नताओं की खोज कर सकते हैं और क्या हम अपने उभय-निष्ठ पूर्वज को फिर से बना सकते हैं और इस प्रकार पता लगा सकते हैं कि विकास के दौरान क्या उत्परिवर्तन हुआ, जिससे हमें अलग बना दिया. मेरा मानना है कि अगली शताब्दी में हमें ऐसा करने की कोशिश करनी चाहिए. यह करने में सैद्धांतिक जीव विज्ञान की आवश्यकता होगी.

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