(कोरा पर एक प्रश्न के उत्तर में)
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पता नहीं कब तक लोग चेतना और भगवान जैसी चीज़ों के पीछे दौड़ते रहेंगे. हमारी आदत रही है कि जिस सब को हम नहीं जानते हैं उसे कोई धुंधला सा लिहाफ़ पहना देते हैं ताकि हमारी "चेतना" यह मान सके कि हम बुद्धिमान हैं. उस लिहाफ़ का नाम चेतना, भगवान, आत्मा, डार्क मैटर जैसे कुछ भी हो सकता है. जब तक लोगों को समझ नहीं आया था कि डीएनए में जीवन का कोड है तब तक वैज्ञानिक भी कहते थे कि शायद कोशिका के केन्द्रक में डार्क मैटर भरा है. ये ब्रह्माण्ड की चेतना के ऐक्य का एक टुकड़ा है, जो हमें चेतन बनाता है. तो अगर आम आदमी उसमें विश्वास रखता है तो वो कोई इतनी बड़ी ग़लती नहीं है.
प्रथम तो चेतना एक शुद्ध वैज्ञानिक शब्द नहीं है. दैनिक जीवन में इसके अलग मायने हैं, मनोविज्ञान-फ़लसफ़े के अध्ययन में अलग और न्यूरोसाइंस में अलग. तिसपर जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वैसे वो इसे अपने दिमाग में फिट कर लेता है. कहीं इसको मानवों का ख़ास गुण मान लिया जाता है, कहीं इसको आत्मा से जोड़ा जाता है और कहीं प्रकृति और पुरुष के विभाजन से.
मनोविज्ञान के अनुसार अपने अस्तित्व और विचारों के बारे में ज्ञान होने को (आत्मज्ञान या सेल्फ-अवेयरनेस) चेतन होना कहते हैं. फ़लसफ़े में तो इसकी हज़ारों परिभाषाएँ हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण है "अनुभव करने की, परिप्रेक्ष्य बनाने की क्षमता". मैं उन लोगों के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता जो इसे एक अलौकिक गतिविधि मानते हैं. आप प्रकृति के ताने-बाने में कितना भी गहरा उतर, लौकिक कारण समझा दो, ये लोग उस वक़्त के ज्ञान की परिधि की ओर इशारा करके कहेंगे कि चेतना वहाँ मिलेगी.
न्याय दर्शन का मुख्य विचार द्वैत है. दुनिया में अच्छा-बुरा, नैतिक-अनैतिक, स्वर्ग-नरक है, वैसे ही प्रकृति और पुरुष भी है. इसी विचार को देकार्ते ने योरोप तक पहुँचाया था. ये विचार समाज में नियम-कानून लागू करने के हिसाब से आरामदायक है पर सत्य की खोज में साफ़ तौर पर भ्रामक. नीत्शे ने इसपर तफ़सील से लिखा है. योग-दर्शन का अद्वैत चेतना का विचार आमजन से थोड़ा हटकर, आध्यात्मिकता में पगे लोगों के बीच बड़ा ख्यात है.
मुझे सांख्य दर्शन और थॉमस हॉब्स के विचारों से लगाव है जिन्होंने इस प्रकार की परिभाषा को सिरे से ग़ैर ज़रूरी करार दिया था और भौतिक पेचीदगी को हमारी समझ का कारण बताया था. आज का विज्ञान इसी आधार पर चेतना की गुत्थी सुलझा रहा है. इसके हिसाब से इन्द्रियों से आने वाले इनपुट के साथ साथ अपने यादों, आवेगों और विचारों को एक परिप्रेक्ष्य से देखना चेतन होना है और यह न्यूरोन्स के क्लिष्ट तंत्र की अभिक्रियाओं का नतीज़ा है. एफ़एमआरआई जैसे तकनीकों के विकास के साथ इस क्लिष्ट तंत्र का एक गहन नक्शा तैयार किया जा रहा है पर सेल्फ-अवेयरनेस को समझने में अभी काफी समय लगेगा. जो कुछ भौतिक लक्षण अब तक बताये गए हैं उन्हें इंसानों के अलावा कई जीवों में पाया गया है और उन्हें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से नियंत्रित किया या बदला जा सकता है.
यदि आप जीव को मारें नहीं बस बेहोश कर दें, सूचना के बहाव में रोड़ा डाल दें तो कोई "चेतना" नहीं बचेगी.
तो असल जीवन का प्रश्न यह नहीं है कि चेतना क्या है और विज्ञान उसकी व्याख्या कैसे करेगा. असल प्रश्न यह है कि हमारा आत्मज्ञान मोड्यूल कैसे काम करता है और क्रमिक विकास के दौरान ये किस तरह बना? क्या नेचुरल सिलेक्शन में आत्मज्ञान का कोई महत्त्व था, या फिर यह हमारे क्लिष्ट तंत्रिका तंत्र का बाई-प्रोडक्ट है?
यदि आत्मज्ञान के आधार पर चेतना को परिभाषित किया जा सकता है तो इंसानों के अज्ञान (जिसे दूर करने की पुरज़ोर कोशिश वो कर रहे हैं) के बावज़ूद एक मोटा-मोटी समझाइश की बात की जा सकती है: चेतना/आत्मज्ञान का क्रमिक विकास समाज के विकास के साथ हुआ. भाषा का इसमें महत्वपूर्ण योगदान था. पर इसका प्राथमिक रूप काम्प्लेक्स शरीर के साथ बना होगा. क्योंकि हमारा शरीर इतने काम्प्लेक्स सिस्टम को सिर्फ़ हॉर्मोन से नियंत्रित नहीं कर सकता, शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों का खाका हमारे परिप्रेक्ष्य की मोनिटरिंग का हिस्सा बन गया और अंगों का न्यूरल माध्यम से नियंत्रण होने लगा. समाज और भाषा के विकास के साथ इस मोनिटरिंग को व्यक्त करना महत्वपूर्ण हो गया और एफ़िशिएन्ट नियंत्रण का बाई-प्रोडक्ट जीव के अस्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया. कालांतर में, आत्मज्ञान की वजह से जीवों के झुण्ड काम्प्लेक्स काम करने लगे और हमारे समाज एक और बड़े स्तर पर संगठित होकर काम करने लगे.
एक कैची फॉर्मेट में रखूँ तो
आत्मज्ञान/चेतना को एक व्यक्तिवादी रचना माना जाता है जबकि इसका अविर्भाव समूहों के बनने से हुआ. इंसान आज इतना सफल मुख्य तौर पर बुद्धिमत्ता के साथ साथ बड़ी संख्या में जुटकर काम करने की वजह से है.
बुद्धिमत्ता तो कम लोगों के पास भी हो तो चलेगा.
विज्ञान प्रयोगों के आधार पर अलौकिक अनुभूतियों को ख़ारिज करता आया है और चेतना के किसी भी अलौकिक हिस्से को सच नहीं पाया गया है. हमारा दिमाग़ इन्द्रियों के अतिरिक्त किसी और स्रोत से सूचना ग्रहण नहीं करता है. लौकिक हिस्सों को विज्ञान धीरे-धीरे समझ रहा है और उनको कृत्रिम रूप से नियंत्रित और निर्मित करने के क़गार पर है.
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