(चार्ल्स फ्रांसिस हौकेट, सितम्बर १९६०, साइंटिफिक अमेरिकन)
भाषा का उद्भव हमेशा वैज्ञानिकों और दार्शनिकों के लिए कौतुहल का विषय रहा है पर बहुत लम्बे समय तक आवश्यक आधारभूत ढांचे और ज्ञान के अभाव में इस विषय की हमारी समझ आगे नहीं बढ़ पाई. चार्ल्स फ्रांसिस हौकेट उन लोगों में से थे जिन्होंने नये संरचनात्मक विचारों के फ्रेम में सोचा और भाषा को डार्विनवाद की दृष्टि से देखा. उन्होंने इंसानी भाषा के तेरह मौलिक लक्षण पहचाने जो एक साथ मिल कर इसे पशुओं की भाषा से अलग करते हैं. जैसा विज्ञान में अधिकतर सिद्धांतों के साथ होता है, हौकेट के विचार आधुनिक इवोल्यूशनरी भाषाविज्ञान के अनुसार असंगत और इंसानों की ओर अनावश्यक झुकाव वाले हैं. पर उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए सैद्धांतिक ढाँचे कि वजह से ही हमारी समझ गहरी हुई है. प्रस्तुत पत्र में उन्होंने भाषा के कुछ लक्षणों का इवोल्यूशन प्राणी-जगत के संचार-तंत्रों से होना सुझाया है. इन सुझावों में से कई बाद के वैज्ञानिक प्रयोगों में सच भी पाए गए.

मानव अकेला ऐसा जीव है जो भाववाचक चिह्नों के माध्यम से बात कर सकता है. पर मानव की इस क्षमता के कई प्राथमिक लक्षण दूसरे जानवरों में भी पाए जाते हैं जिनसे भाषा का उद्भव हुआ.

क़रीब ५० साल पहले लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ़ पेरिस ने यह निश्चय किया कि वो अपने सत्र में भाषा के उद्भव पर कोई पत्र शामिल नहीं करेंगे. भाषा के उद्भव पर अटकलबाज़ी उन्नीसवीं शताब्दी में बहुत आम थी पर उसका कोई ठोस परिणाम नहीं निकला. लिंग्विस्टिक्स के क्षेत्र में इस पूरे ताम-झाम को बेवकूफी भरा माना जाने लगा. इन अटकलबाज़ियों में से दो काफ़ी तार्किक और प्रयोगधर्मी थीं, हालाँकि, प्रयोगों ने उन्हें ग़लत साबित कर दिया.
एक शताब्दी पहले तक दुनिया के कई कोने यूरोपियन यात्रियों की पहुँच से बाहर थे. यूरोपियन विद्वानों के लिए यह सोचना वाज़िब था कि सुदूर इलाकों में कोई नर-वानर या ह्यूमनोइड मिल सकतें है जिनकी भाषा अर्द्धविकसित हो और भाषा के विकास की पहली पीढ़ियों की झलक दे सकती हो. पर कोई इस प्रकार की जनजातियों को नहीं ढूंढ पाया. दुनिया में कोई ऐसी भाषा नहीं मिली जिसे वाकई में अर्द्धविकसित कहा जा सकता हो. एडवर्ड सापिर ने १९२१ में लिखा, “भाषा के बारे में सबसे अनोखी बात है इसकी सार्वभौमिकता. कोई किसी जनजाति की कला या धर्म की समझ पर सवाल उठा सकता है, पर हम ऐसे किसी इंसानी समूह को नहीं जानते जहाँ एक पूर्णतः विकसित भाषा काम न ली जाती हो. दक्षिण अफ्रीका का सबसे नीचा, झाड़ी पर गुज़र करने वाला इंसान भी ऐसे प्रतीकों से लदे तंत्र में बात करता है जो किसी सभ्य फ्रेंच व्यक्ति की भाषा के बराबर बैठता है.”
दूसरा विचार ऐतिहासिक भाषाविज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन पर टिका था, एक खोज जो उस समय गर्व का विषय हुआ करती थी. दो भाषाओँ के बीच इतनी जमी-जमाई समानता होती थी कि इसका कारण सिर्फ संयोग और सामानांतर विकास को नहीं ठहराया जा सकता था. ऐसा कहा जा सकता है कि दोनों भाषाएँ एक ही मूल भाषा से निकलीं हैं. इंग्लिश, डच, जर्मन और कई स्केन्डिनेवियन भाषाएँ इसी प्रकार एक दूसरे से सम्बद्ध हैं. इस प्रकार सम्बंधित भाषाओँ के समूह के तुलनात्मक अध्ययन से मूल भाषा का तफ़सीली रीकंस्ट्रक्शन किया जा सकता है, उदाहरण के लिए, प्रोटो-जर्मेनिक भाषा. प्रोटो-जर्मेनिक भाषा का कोई दस्तावेज़ मौज़ूद नहीं है पर इस भाषा को हम जितना समझते हैं उतना कुछ वर्तमान विश्व में बोली जाने वाली भाषाओँ को भी नहीं समझते.
शुरुआत में उम्मीद थी कि तुलनात्मक अध्ययन भाषा के प्रारंभिक लक्षणों को पहचानने में मददग़ार होगा. यह उम्मीद उस समय तार्किक थी क्योंकि ऐसा माना जाता था कि भाषा कुछ हज़ार साल पुरानी थी और बार बार ऐसा देखने में आया कि वो भाषाएँ जो सम्बंधित नहीं मानी जाती थीं, असल में सम्बंधित थीं. तुलनात्मक अध्ययन से भले ही भाषा की शुरुआत तक नहीं पहुंचा जाता पर बोलने के अर्द्धविकसित तरीकों कि कुछ निशानियाँ तो मिल हीं जातीं — जो शोधकर्ताओं को पहली भाषा का अनुमान लगाने में सहायक साबित होता. यह उम्मीद भी व्यर्थ ही रही. रीकंस्ट्रक्ट की हुई सबसे पुरानी भाषा भी आधुनिक भाषाओँ जैसी ही पेचीदा और फ्लेक्सिबल हैं.
आधी सदी पहले, पेरिस वाली घटना से पहले, ये सभी बातें साफ़ हो चुकीं थीं. वैज्ञानिक ऐसे किसी बैन का समर्थन तो नहीं कर सकते, पर इस मामले में फ़ायदा यह हुआ कि शोधकर्ताओं ने आधुनिक भाषाओँ के बारे में बेहतर सूचना इकठ्ठा करने में अधिक श्रम लगाया. नतीज़तन, हमारी भाषा की समझ में ज़बरदस्त प्रगति हुई. कई हमराह इलाकों में शोध ने लम्बे डग भरे: जूलॉजिस्ट क्रमिक विकास को बेहतर समझने लगे, अन्थ्रोपोलॉजिस्ट संस्कृति की प्रकृति को बेहतर समझने लगे. इसके बाद इंसानी भाषा के उद्भव को समझने की नयी कोशिशें निर्विवाद रूप से शुरू कीं जा सकतीं थीं.
लिंग्विस्टिक्स पर आधारित तुलनात्मक अध्ययन से भाषा के उद्भव को समझने में कोई मदद नहीं मिली थी. पर उस दिशा में शोध एक जूलॉजिस्ट के नज़रिए में ढ़लकर आगे बढ़ सकता था. फ्रेम ऑफ़ रेफेरेंस ऐसी होनी चाहिए जिससे इंसानी भाषाएँ एक जैसी दिखे और उनकी तुलना अन्य पशुओं के बात करने के तरीकों से, ख़ास तौर पर इंसान के नज़दीकी रिश्तेदार होमिनिड, गिबन और ग्रेट एप्स से हो सके. ऐसी तुलना के लिए उपयोगी केस बहुत कम हैं. न काम लिए जा सकने वाले केसेज़ में उदहारण के तौर पर, “आकाश” इंसानी भाषाओँ का अहम हिस्सा है पर गिबन की पुकारों में इस तरह का कोई शब्द नहीं है. न ही हम “ख़तरा” इस्तेमाल कर सकते हैं जो गिबन काम लेते हैं. इसकी बजाय हमें कुछ ऐसे लक्षण काम लेने होंगे जिनका बात करने के माध्यमों में उपस्थित होना या न होना उन माध्यमों के इंसानी, पाशविक या मशीनी होने पर निर्भर नहीं करता.
इस तरह के तुलनात्मक अध्ययन से होमिनिड्स वंश के सुदूर पूर्वजों की बात करने की आदतों को रीकंस्ट्रक्ट किया जा सकता है. इन्हें हम प्रोटो-होमिनिड्स का सकते हैं. अब काम बचता है उस क्रम को समझना जिसमें भाषा के ये लक्षण नर-वानर से नर बनने की यात्रा में शामिल हुए.
लेख में १३ ऐसे लक्षणों को एक चित्र में प्रदर्शित किया गया है. काफ़ी प्रयोगों के नतीज़े यह स्थापित करते हैं कि ये सभी लक्षण हमारी सारी भाषाओँ में मौज़ूद हैं. इनमें से कई इतने साधारण और सरल लगते हैं कि भाषा का अध्ययन करता कोई व्यक्ति उनपर ध्यान भी नहीं देगा. उनकी अहमियत तभी महसूस होती है जब हम ये पाते हैं कि ये लक्षण जानवरों में अथवा भाषा के अलावा बात करने के इंसानी तरीकों में मौज़ूद नहीं हैं.
पहला लक्षण है “बोलने-सुनने का माध्यम” — ये शायद एकदम साफ़ दिखता है. वार्तालाप के कई ऐसे तरीक़े हैं जो अन्य माध्यमों को इस्तेमाल करते हैं, जैसे, इशारे, मधुमक्खियों का नृत्य, स्टिकलबैक मछली का प्रणय निवेदन, इत्यादि. बोलने और सुनने के माध्यम से वार्तालाप का फ़ायदा यह है, कम से कम प्राइमेट्स के लिए, कि शेष शरीर अन्य कार्यों को साथ ही करने के लिए स्वतंत्र रहता है.
अगले दो लक्षण — “फटाफट मिट जाना” और “प्रसारण एवं सदिश रिसेप्शन”, जो ध्वनि की भौतिकी से उभरते हैं — बोलने-सुनने के माध्यम का लगभग अनिवार्य नतीजा हैं. भाषिक संकेत स्रोत के आस पास मौज़ूद कोई भी कान-जैसा तंत्र सुन सकता है और दो कानों वाला तंत्र स्रोत की दिशा भी पता लगा सकता है. संकेतों के मिट जाने का अर्थ है कि सुनने वाले कि सुविधा के लिए इस प्रकार के संकेत हवा में तैरते नहीं रहेंगे. जबकि जानवरों की गंध या निशान कुछ समय के लिए अपनी जगह रहते हैं. इसी प्रकार, मनुष्य के अभी अभी हुए सांस्कृतिक विकास से निकले तरीके, लेखन, के निशान भी नहीं मिटते हैं.
“अदला-बदली” और “पूरे फ़ीडबैक” का महत्त्व अन्य तंत्रों से तुलना करने पर साफ़ हो जाता है. आम तौर पर, किसी भाषा को बोलने वाला उसकी समझ के दायरे में पड़ने वाले किसी भी भाषिक संकेत को वापस प्रसारित कर सकता है, जबकि नर और मादा स्टिकलबैक के प्रणय निवेदन के पैंतरे अलग-अलग होते हैं और दोनों में से कोई भी विपरीत लिंग के लिए बना नृत्य ख़ुद नहीं कर सकता. ठीक यही बात इंसानों में माता-शिशु के बीच वार्तालाप में भी होती है. भाषा बोलने वाला फ़ीडबैक कि वजह से अपने द्वारा कही गयी बातों का भाषाई महत्त्व पूरी तरह से समझ सकता है जबकि नर स्टिकलबैक अपनी आँख और पेट का रंग, जो कि मादा को उत्तेजित करने के लिए अनिवार्य है, नहीं देख सकता. फ़ीडबैक ज़रूरी है क्योंकि इसके कारण बातचीत को अन्दर उतारना संभव हो पाता है और जो “सोच-विचार” का एक बड़ा हिस्सा है.
छठा लक्षण, “विशिष्टीकरण”, यह है कि बोलने में लगा श्रम और उससे फैलने वाली ध्वनि तरंगें संकेत के अलावा कोई काम नहीं करते हैं. कुत्ते, जीभ लटका कर हाँफते हुए एक महत्वपूर्ण जैव क्रिया करते हैं, क्योंकि इस तरह कुत्ते अपने शरीर का तापमान ठंडा बनाए रखते हैं. हाँफते के साथ कुछ आवाज़ भी होती है जिससे आस पास के कुत्तों या इंसानों को उनकी मौज़ूदगी और उनके भाव पता चलते है. पर, जानकारी का यह प्रसारण सही अर्थों में एक साइड इफ़ेक्ट है. न ही कुत्ते का हाँफना “अर्थपूर्णता” जैसा कोई लक्षण दिखाता है. यह कोई संकेत नहीं है जिसका अर्थ कुत्ते का तपा हुआ होना है; यह तपे हुए होने का हिस्सा है. भाषा में किसी सन्देश का एक निश्चित प्रभाव होता है क्योंकि शब्दों और हमारे संसार के गुणों/परिस्थितियों में निर्धारित सम्बन्ध हैं. गिबन की पुकार में अर्थपूर्णता होती है. उदहारण के तौर पर, गिबन खतरे के लिए एक आवाज़ का इस्तेमाल करते हैं. अब यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है कि उस आवाज़ के मायने “आग!” की चिल्लाहट की तुलना में बहुत फैले हुए हैं.
अर्थपूर्ण बातचीत में अर्थपूर्ण सन्देश और उसके अर्थ के बीच सम्बन्ध मनमाना या सोचा-समझा हो सकता है. जबकि भाषा में ये सम्बन्ध मनमाने ही होते हैं. शब्द “नमक” नमकीन या दानेदार नहीं है; “कुत्ता” कैनाइन नहीं है; “व्हेल” एक बड़ी चीज़ का बहुत छोटा नाम है और माइक्रोओर्गेनिज्म उसका ठीक उल्टा है. जबकि एक तस्वीर अपने अर्थ के जैसी दिखती है. मधुमक्खी का नाच उसको मिले मधु के स्रोत के पास होने पर तेज़ और दूर होने पर धीमा होता है. भाषा में “मनमाना अर्थ” होने के लक्षण का नुकसान है कि वह मनमाना है. पर उसका फायदा यह है कि असंख्य विषयों पर बातचीत की जा सकती है.
इंसानों के बोलने वाले अंग एक बहुत बड़ी रेंज की आवाज़ें पैदा कर सकते हैं. पर किसी भी भाषा में इसके छोटे छोटे हिस्से ही काम लिए जाते हैं और ये हिस्से अपने काम के हिसाब से एकदम भिन्न हैं. अंग्रेज़ी के शब्दों “पिन” और “बिन” को सुनने में एक ही स्थान पर फ़र्क आता है. यदि बोलते वक़्त कोई पिन को बिन की तरह बोलता है तो वह सिर्फ़ पिन या बिन को अस्पष्ट तरीक़े से कह रहा है, एक नया शब्द नहीं बना रहा. हो सकता है कि सुनने वाला कोशिश करे, सन्दर्भ के अधार पर कहने वाले का अभिप्राय समझ जाए और हो सकता है कि कुछ न समझे. यह “असतत” होने का लक्षण भाषा को आवाज़ में निहित इशारों से अलग करता है. आवाज़ को एक सतत स्केल पर अलग-अलग स्तर पर ले जा कर कोई गुस्सा या गुप्तता दिखा सकता है. इसी प्रकार, मधुमक्खियों का नाच भी एक सतत स्केल पर होता है, असतत नहीं.
ऐसा लगता है कि इंसान शायद अकेला ऐसा प्राणी है जो ऐसी चीज़ों के बारे में बात कर सकता है जो स्थान और काल (अथवा दोनों) में उससे दूर हैं. यह लक्षण — “विस्थापन” — इंसान के नज़दीकी रिश्तेदारों में निश्चित रूप से नहीं पाया जाता, यद्यपि, यह मधुमक्खियों के नाच में पाया जाता है.

भाषा के सबसे महत्वपूर्ण लक्षणों में से एक है, “नवाचार”; मतलब ऐसी चीज़ें कहने की क्षमता जो पहले कभी नहीं कही या सुनी गयी हैं और जिसे उस भाषा के बोलने वालों द्वारा अभी तक समझा जाना शेष है. अगर एक गिबन कोई आवाज़ निकालता है तो यह जानी पहचानी गिबन पुकारों की डिक्शनरी में से कोई एक होगी. इस प्रकार के पुकारों के तंत्र को “बंद” कहा जा सकता है. भाषा को खुला या “नवाचारी” तभी कहा जा सकता है जब कोई पुरानी, सुनी-सुनाई बातों के टुकड़े उन्हीं बातों के ढंग से जोड़कर एक नया कहन बना सकता है.
इंसानों के जीनों में भाषा सीखने की क्षमता निहित है और ऐसे कार्य के लिए जबरदस्त इच्छाशक्ति भी. पर भाषाई परम्परों का तफ़सीली से हस्तांतरण अनुवांशिकता से परे, सीखने और सिखाने से होता है. हम नहीं जानते कि इस प्रकार के “परंपरागत हस्तान्तरण” का गिबन या अन्य स्तनपायी जीवों के पुकारों के तंत्र में क्या महत्त्व है. कुछ मामलों में दुनिया के अलग अलग कोनों में पायी जाने वाले एक ही प्रजाति के व्यक्तियों की आवाज़ों में समानता इतनी जबरदस्त होती है कि उसका कारण अनुवांशिक ही हो सकता है.
किसी भाषा की रोज़मर्रा की बातचीत के अर्थपूर्ण तत्व — “शब्द”, जिन्हें एक भाषाविद “मॉर्फ़ीम” कहेगा, बहुत बड़ी संख्या में होते हैं. फिर भी, इन शब्दों को बनाने वाली अपने आप में अर्थहीन ध्वनियाँ संख्या में बहुत कम होतीं हैं. यह “संरचना का द्वैत” अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों “कैट”, “एक्ट” और “टैक” में देखा जा सकता है. ये तीनों एकदम अलग मायने वाले शब्द तीन ही अर्थहीन आवाजों के अलग-अलग तरह से संयोजन से बने हैं.


यह ध्यान में रखा जाए कि ये तेरह लक्षण एक दूसरे से पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं. ख़ास तौर पर एक तंत्र मनमाना/सोचा-समझा नहीं हो सकता यदि उसमें अर्थपूर्णता नहीं है, और यदि उसमें अर्थपूर्णता नहीं है
तो उसकी संरचना में द्वैत नहीं हो सकता. यह भी ध्यान रहे कि इस सूची में अलग-अलग प्रजातियों के वार्तालाप के सभी लक्षण शामिल नहीं किये गए हैं बल्कि सिर्फ़ वही जो भाषा के लिए साफ़ तौर पर महत्वपूर्ण हैं.
शायद हम आराम से मान सकते हैं कि तेरह लक्षणों में से नौ प्रोटो-होमिनिड्स के बोलने-सुनने पर आधारित वार्तालाप में मौज़ूद थे — वो नौ जो साफ़ तौर पर आधुनिक गिबन और मानवों में मिलते हैं. मतलब, एक दर्जन के आस पास अलग-अलग पुकारें थीं, हरेक आवाज़ किसी बार-बार घटने वाले, जैविक रूप से महत्वपूर्ण परिस्थिति का उचित जवाब: खाना मिलना, शिकारी का पता लगना, सेक्सुअल रूचि, माँ द्वारा देख-रेख की आवश्यकता इत्यादि. यह पता लगाना कि इस प्रकार के तंत्र में चार अतिरिक्त लक्षण (विस्थापन, नवाचार और पूरी तरह से विकसित परंपरागत संचार) कैसे विकसित हुए, इंसानी बोलचाल के उद्भव की समस्या को सुलझा सकता है. यह ठीक है कि पूरी कहानी में बातचीत के अलावा भी कई चीज़ें शामिल होंगीं. इस विकास को प्राइमेट्स के झुण्ड के एक आदिम शिकारी समाज में इवोल्यूशन के सन्दर्भ में, व्यवहार के इवोल्यूशन में एक महत्वपूर्ण हिस्से की तरह देखा जा सकता है.
ऐसा संभव है कि एक “बंद” तंत्र कुछ हद तक शेष तीन लक्षणों की अनुपस्थिति में भी “नवाचारी” हो जाए. इंसानी बोलचाल में ऐसा एक परिदृश्य है जिससे इस प्रकार का प्रभाव पैदा हो सकता है: “सम्मिश्रण ”. कई बार बोलने वाला दो शब्दों या वाक्यांशों में से एक को काम लेने में हिचकिचाता है क्योंकि दोनों परिस्थिति के लिए उपयुक्त हैं और कुछ दोनों के मिश्रण से बना कुछ कह जाता है. जबान फिसलने में मिश्रण होना आम है पर यह कुछ नया कहने का तरीका भी हो सकता है.
समाज की भाषा सीखते बच्चे एक ऐसे दौर से गुजरते हैं जो ठीक गिबन की पुकारों की भांति “बंद” होता है. बच्चे के पास कई दर्जन वाक्यों का कोष हो सकता है; हरेक वाक्य की अंदरूनी संरचना एक वयस्क के हिसाब व्याकरण से बनी होगी पर बच्चे के लिए वो एक अभाज्य इकाई है. वह आस-पास के वयस्कों से एकदम नए बोल सीख सकता है. पर बच्चे का महत्वपूर्ण कदम तब आता है जब वह कुछ ऐसा कहता है जिसे उसने किसी और से नहीं सीखा है. ऐसा वह तभी कर सकता है जब वो पहले से ज्ञात दो बोलों को मिलाए.
गिबन या प्रोटो-होमिनिड्स की “बंद” पुकारों में नई इकाइयाँ जुड़ने का दूसरी प्रजातियों की नक़ल के अलावा कोई स्रोत नहीं है. इससे नवाचार नहीं होगा, सिर्फ़ पुकारों की संख्या बढ़ जाएगी. पर “सम्मिश्रण” हो सकता है. मान लीजिये, “कच” भोजन के लिए और “तप” ख़तरे के लिए निर्धारित पुकारें हैं, दोनों अपने आप में काफी जटिल ध्वनियाँ. मान लीजिये कि प्रोटोहोमिनिड को भोजन दिखा और साथ ही एक शिकारी भी दिखा. यदि दोनों चीज़ें एक ख़ास कॉम्बिनेशन में होतीं हैं तो वह जल्दबाज़ी में “कचतप” या “तपकच” कह सकता है, हो सकता है “कत” या “चप” भी कह दे. इनमें से कोई भी बोल सम्मिश्रित होगा. तब “कत” का अर्थ हो जाएगा “भोजन के साथ ख़तरा”. इससे “कच” और “तप” के अर्थ भी बदल जायेंगे; क्रमशः, “ख़तरे के बिना खाना” और “खाने के बिना ख़तरा”. और इस प्रकार ये सभी पुकारें भाषा की इकाई होने की जगह छोटी अर्थपूर्ण इकाइयों का सम्मिश्रण बन जाएँगी: ‘क’ का अर्थ होगा ‘खाना’, ‘च’ का ‘ख़तरा नहीं’, ‘त’ का ‘ख़तरा’ और ‘प’ का ‘ख़तरा नहीं’.

पर, यह पूरी कहानी का एक हिस्सा भर है. सम्मिश्रण का कोई असर नहीं होगा यदि वो किसी को समझ नहीं आता है. इंसान सम्मिश्रण को समझने में इतने कुशल हैं कि सम्मिश्रण और शुद्ध शब्द की पुनरावृति में फ़र्क करना मुश्किल है, सिवाय जबान फिसलने के, जो कि बच्चों से सहज ही हो जाता है. इस तरह की समझने की क्षमता प्रोटोहोमिनिड्स में नहीं पायी जाती थी, इसलिए, ऐसा माना जा सकता है कि कई हज़ार सालों में कभी कभी सम्मिश्रण हुए (शायद वो गिबन और बड़े बंदरों में अब भी होते हैं), जिनका सुनने वालों पर बमुश्किल अर्थपूर्ण असर हुआ होगा. उसके बाद ही सम्मिश्रणों की समझ इस हद तक बढ़ी कि वह अधिक सम्मिश्रणों के उत्पादन को जोर देने लगी. ऐसा होने पर “बंद” बातचीत के तंत्र खुल गए.
यह भी देख पाना संभव है कि विस्थापन के हलके लक्षण नवाचार, द्वैत और पूरी तरह से परंपरागत संचार के बग़ैर भी पुकारों के तंत्र में विकसित होते हैं. संभव है कि प्रारंभिक होमिनिड्स में किसी नरवानर ने ख़ुद बिना नज़र आये एक शिकारी को देखा होगा. संभव है कि किसी कारण से — शायद डर से — वह चुपचाप छुपकर अपने झुण्ड की तरफ लौट गया और फिर कुछ देर बाद ही उसने ख़तरे की पुकार निकाली. इससे पूरे झुण्ड को शिकारी से बचकर भागने का बेहतर मौका मिला होगा, जिससे इस देरी का कारण कुछ हद तक उत्तरजीविता के लिए महत्वपूर्ण बन गया.
अपने साथ पत्थर या लकड़ी लेकर घूमना कुछ कुछ बातचीत के विस्थापन जैसा है — जैसे आज इस बारे में बात करना कि कल क्या करना है. हाँ, यह नहीं कहा जा सकता कि पहली बार औज़ार लेकर घूमने का कोई उद्देश्य रहा होगा, न ही पहली विस्थापित बातचीत योजनाओं पर विचार-विमर्श रही होगी. शिकारी द्वारा घेर लिए जाने पर आदिम होमिनिड ने डर के मारे अपने पत्थर या लकड़ी से वार किया होगा; किस्मत से शत्रु को नाकाम कर दिया होगा. दूसरे शब्दों में, शुरूआती औज़ार लेकर घूमने की आदत उद्देश्यहीन पर नतीज़तन फायदेमंद रही होगी. फिर, आनुवांशिकता या परंपरा के माध्यम से यह आदत प्रजाति के व्यवहार में शामिल हो गया होगा. अंततः, इस तरह की घटनाओं से सोचा समझा व्यवहार पैदा हुआ.
हालांकि, विस्थापन के गुण इस तरह विकसित हो सकते हैं पर मोटे तौर पर यह अधिक संभव है कि के बाद बातचीत में विस्थापन और परंपरागत संचार की क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी नवाचार के कारण हुई हो. एक नवाचारी तंत्र में युवतर पीढ़ी को उन सब तरीकों पर पकड़ बनानी होगी जिनसे छोटे अर्थपूर्ण तत्वों से सम्पूर्ण संकेत बनाए जा सकते हैं, जिनमे से कुछ सम्पूर्ण संकेत से इतर कभी अकेले काम नहीं लिए जायेंगे. ऐसा इंसानों के बच्चों के भाषा सीखने के तरीके से ही किया जा सकता है: कुछ बोलों को इकाइयों की तरह सीखकर, समय के साथ कोष के अलग अलग सम्मिश्रण आजमाकर, सम्मिश्रण की संरचना को इस तरह से ठीक करना कि वो वयस्कों के बोलों से मिलने लगे और समझ में आने लगे. सीखने की इस प्रक्रिया का कुछ हिस्सा उन परिस्थितियों से दूर होता है जिनके लिए इस प्रकार के जवाब/बोल उपयुक्त हैं — मतलब विस्थापन को बढ़ावा मिलेगा. फिर, सीखने और सिखाने के लिए झुण्ड के पास उपलब्ध परंपरागत संचार के तरीक़ों की ज़रूरत पड़ती है. जब तक बातचीत के तंत्र उत्तरजीविता के लिए महत्वपूर्ण है, परंपरागत संचार और विस्थापन की क्षमता भी उत्तरजीविता के लिए अहम रहेगी. फिर, ये क्षमताएँ बातचीत के तंत्र का उत्तरजीविता के लिए महत्त्व बढ़ा देतीं हैं. इस प्रकार, एक बच्चे को सिखाया जा सकता है कि कई ख़तरे बिना उनका असल जीवन में सामना किये टाले जा सकते हैं.
ये घटनाएँ बड़े और जटिल दिमागों के विकास से भी आवश्यक तौर पर जुड़ीं हैं, जो जटिल बातचीत के तंत्रों के नियमों और अन्य परंपरागत संचार के तौर-तरीकों के लिए बेहतर स्टोरेज उपलब्ध करातीं हैं. इसलिए व्यवहार का अनुकूलन संरचना में आनुवांशिक चयन और फेरबदल बेहतर बनाता है. बचपन में लम्बे समय तक असहाय होना लम्बे समय तक सीखने की फ्लेक्सिबिलिटी भी बनाए रखता है. इसलिए लम्बे बचपन का चयन होता है, परिपक्वता देरी से आती है और जीवनकाल लम्बा होता है. चूंकि, बच्चों को ज़्यादा सीखना होता है और नर-मादा दोनों के काम सिखाए जाने होते हैं, पिता घर पर ज़्यादा समय निकालते हैं. विस्थापन में बढ़ोतरी से रखरखाव और दूरदर्शिता बढ़ती है: नर अपनी सहवासी को बचाता है और सतर्क होकर उसे दूसरे नरों से दूर रखता है, जब वह स्वयं उसको न चाहे तब भी.
इस बात को मानने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि संरचना का द्वैत सबसे आख़िर में जुड़ने वाला लक्षण था. क्योंकि यदि बोलचाल का तंत्र बहुत ज़्यादा जटिल नहीं है तो इस लक्षण के होने का कोई कारण नहीं मिलता. अगर एक बोलने-सुनने वाले संचार तंत्र में बहुत सारे भिन्न-भिन्न अर्थपूर्ण तत्व हैं, तो उन तत्वों की आवाज़ एक दूसरे के जैसी होने लगेगी. व्यावहारिक तौर पर, कोई भी प्रजाति या मशीन सीमित संख्या में भिन्न संकेत दे सकती है, विशेषकर शोर भरे वातावरण में. मान लीजिये कि सैमुएल एफ़ बी मोर्स ने टेलीग्राफ कोड तंत्र बनाते वक़्त ०.१ सेकंड लम्बा “ए”, ०.२ सेकंड लम्बा “बी” और इस प्रकार २.६ सेकंड लम्बे “ज़ेड” तक संकेत चुने होते. ऑपरेटर्स को ऐसा कोई भी तंत्र सीखने और काम लेने में बहुत तकलीफ़ होती. असल में, मोर्स ने संरचना का द्वैत इस्तेमाल किया. टेलीग्राफ ऑपरेटर को सिर्फ़ दो तरह की पल्स लम्बाइयों और तीन तरह की अंतराल लम्बाइयों को अलग करके समझना सीखना होता है. हर अक्षर इन्हीं आधारभूत अर्थहीन इकाइयों के अलग अलग संयोजन से बना होता है. ये संयोजन आसानी से दूर रखे जा सकते हैं क्योंकि अर्थहीन इकाइयाँ बहुत स्पष्ट तौर पर भिन्न होतीं हैं.

क्रमिक विकास के सिद्धांत का एक बुनियादी नियम है कि किसी भी नए परिवर्तन का शुरूआती उत्तरजीविता में महत्त्व सीमित होता है ताकि बदले हालात में साधारण और परम्परागत रहन-सहन बनाए रखा जा सके. प्रोटोहोमिनिड्स कि बनावट में ऐसा कुछ नहीं था जो उनके वंशजों को इंसान बनता. उनमें से कई बने भी नहीं. वो ऐसी परिस्थिति की पनाह में पहुँचे जहाँ पर्याप्त भोजन था और शिकारियों से आसानी से बचा जा सकता था, जहाँ भाषा की प्रारंभिक पौध विकसित करने का कोई फ़ायदा नहीं था. वो आज भी अपने कई ख़ास गुण लिए बचे हुए हैं, जैसे गिबन और बड़े बन्दर.
इंसान के अपने सुदूर पूर्वज तब ऐसी परिस्थितियों में पहुंचे होंगे जहाँ थोड़ा ज़्यादा फ्लेक्सिबल बातचीत का तंत्र, औज़ारों बनाने और उन्हें लिए हुए घूमने की नयी आदत, और परंपरागत संचार कि क्षमता में थोड़ी बढ़ोतरी — पुराने प्रोटोहोमिनिड तरीक़ों से बचे रहने के लिए बस काफ़ी रहे होंगे. बहुत सारी संभावनाएं हैं. यदि शिकारी बहुत सारे और ज़्यादा ख़तरनाक हो जाते, किसी औज़ार का हथियार की तरह हाथोंहाथ इस्तेमाल, मिलजुलकर भागने या हमला करने का कोई प्रयास संतुलन बनाने में कारगर होता. अगर भोजन की कमी होती तो ज़्यादा कड़े खोल तोड़ने, बड़े इलाक़े में खाना ढूँढने, ऐसे इकठ्ठा किया हुआ खाना साझा करने और भविष्य के लिए संभाल कर रखने की कोई भी तकनीक झुण्ड के बचे रहने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती थी. बहुत लम्बे समय तक ऐसे छोटे छोटे बदलाव होने से ही बदलाव के घटक — नयी भाषा, औज़ार काम लेने के नए तरीक़े, नयी संस्कृति — एक नई जीवन शैली का पथ प्रशस्त करने लगे होंगे, जिसे मानव कहा गया.
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